SEBI रिपोर्ट: ब्राज़ील में 97%, अमेरिका में 67% – सिर्फ भारत ही नहीं, दुनियाभर में डूबता है रिटेल ट्रेडर्स का पैसा

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हाइलाइट्स-Global Retail Trading Losses

  • ब्राज़ील में 300 दिन से ज़्यादा डे ट्रेडिंग करने वालों में से 97% को घाटा हुआ.
  • यूरोप में CFD ट्रेडिंग करने वाले 74% से 89% रिटेल अकाउंट नुकसान में रहे.
  • ब्रिटेन में 82% और ऑस्ट्रेलिया में 68% CFD निवेशकों को घाटा झेलना पड़ा.
  • अमेरिका में हर 3 में से 2 रिटेल फॉरेक्स अकाउंट हर तिमाही घाटे में रहते हैं.

भारत में F&O ट्रेडिंग करने वाले ज़्यादातर लोगों को घाटा होने की बात अक्सर सामने आती रहती है, लेकिन सेबी की ताज़ा रिपोर्ट बताती है कि यह अकेले भारत की कहानी नहीं है. अगस्त 2026 में जारी इस रिपोर्ट में दुनियाभर के डेरिवेटिव्स और लीवरेज्ड प्रोडक्ट बाजारों का तुलनात्मक आंकड़ा भी शामिल किया गया है, जिसके मुताबिक ब्राज़ील में 300 दिन से ज़्यादा समय तक डे ट्रेडिंग करने वाले लोगों में से 97% को घाटा हुआ.

असल में यह अकेला उदाहरण नहीं है. रिपोर्ट में अमेरिका, यूरोप, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया, दक्षिण कोरिया और ताइवान जैसे बाजारों के भी हवाले दिए गए हैं, जो लगभग एक जैसी तस्वीर दिखाते हैं- रिटेल ट्रेडर्स के लिए डेरिवेटिव्स और लीवरेज्ड प्रोडक्ट्स में मुनाफा कमाना दुनिया के हर बड़े बाजार में मुश्किल साबित होता रहा है.

क्या कहते है ब्राज़ील और अमेरिका के आंकड़े?

ब्राज़ील में शोधकर्ता शागे, डी-लोसो और जियोवानेटी ने 2020 में एक अध्ययन किया, जिसमें उन्होंने ऐसे लोगों को ट्रैक किया जिन्होंने इक्विटी-इंडेक्स फ्यूचर्स में डे ट्रेडिंग शुरू की थी. जिन लोगों ने 300 दिन से ज़्यादा समय तक ट्रेडिंग जारी रखी, उनमें से 97% को नेट घाटा हुआ, और सिर्फ 1.1% लोग ही ब्राज़ील की न्यूनतम मज़दूरी से ज़्यादा कमा पाए.

वहीं अमेरिका में जॉर्डन और डिल्ट्ज़ ने 2003 में डे ट्रेडर्स पर किए अपने अध्ययन में पाया कि करीब 67% ट्रेडर्स को नुकसान हुआ, और सिर्फ करीब 20% ही मामूली से ज़्यादा मुनाफे में रहे. अमेरिका के रेगुलेटर CFTC के मुताबिक हर तिमाही में करीब दो-तिहाई रिटेल फॉरेक्स अकाउंट घाटे में रहते हैं.

यूरोप और ब्रिटेन का डेटा क्या कह रहा है ?

यूरोपियन सिक्योरिटीज एंड मार्केट्स अथॉरिटी यानी ESMA के एक रिव्यू के मुताबिक यूरोपीय देशों में CFD यानी कॉन्ट्रैक्ट फॉर डिफरेंस ट्रेड करने वाले 74% से 89% रिटेल अकाउंट औसतन नुकसान में रहे, जिसमें औसत घाटा 1,600 यूरो से 29,000 यूरो के बीच रहा.

फ्रांस के नियामक AMF ने भी पाया कि चार साल की अवधि में CFD और फॉरेक्स ट्रेडिंग करने वाले 89% से ज़्यादा रिटेल निवेशकों को घाटा हुआ, जिसमें प्रति ग्राहक औसत नुकसान करीब 10,900 यूरो रहा. वहीं ब्रिटेन के फाइनेंशियल कंडक्ट अथॉरिटी यानी FCA के एक विश्लेषण में सामने आया कि 82% ग्राहकों को CFD ट्रेडिंग में घाटा हुआ, जिसके बाद रेगुलेटर ने फर्मों को घाटे में रहने वाले अकाउंट का प्रतिशत सार्वजनिक करना अनिवार्य कर दिया.

देश/क्षेत्रप्रोडक्टघाटे की दर
यूरोपियन यूनियनCFDs74%-89%
फ्रांसCFDs/फॉरेक्स89%
ब्रिटेनCFDs~82%
ऑस्ट्रेलियाCFDs~68%
अमेरिकारिटेल फॉरेक्स~67%
ब्राज़ीलइक्विटी-इंडेक्स फ्यूचर्स97%*

*300 दिन से ज़्यादा डे ट्रेडिंग करने वालों में

एशिया-पैसिफिक बाजारों की कहानी भी अलग नहीं है

दक्षिण कोरिया के KOSPI 200 फ्यूचर्स बाजार में चो और ईओम ने 2009 में पाया कि फीस काटने के बाद सिर्फ करीब 25% रिटेल डे ट्रेडर्स ही मुनाफे में रहे, यानी करीब 75% को घाटा हुआ. इसके बाद 2012 में रयू के अध्ययन में भी यही पैटर्न दोहराया गया, जिसमें ज़्यादा और तेज़ ट्रेडिंग करने वालों के नतीजे और खराब पाए गए.

ताइवान में कुओ और लिन ने 2013 में 3,470 इंडिविजुअल डे ट्रेडर्स का अध्ययन किया, जिसमें ट्रांजेक्शन कॉस्ट के बाद औसत घाटा NT$61,500 पाया गया. इस अध्ययन की खास बात ये रही कि ज़्यादा अनुभव रखने वाले ट्रेडर्स भी बेहतर स्किल या कम घाटे में तब्दील नहीं हो पाए. वहीं ऑस्ट्रेलिया के रेगुलेटर ASIC के मुताबिक वित्त वर्ष 2024 में 68% रिटेल CFD निवेशकों को घाटा हुआ, जिसमें कुल नुकसान 45.8 करोड़ ऑस्ट्रेलियाई डॉलर से ज़्यादा रहा, जिसमें से 7.3 करोड़ डॉलर सिर्फ फीस के तौर पर गया.

  • ब्राज़ील में डे ट्रेडिंग घाटे की दर सबसे ज़्यादा, 97% तक
  • दक्षिण कोरिया में KOSPI फ्यूचर्स में करीब 75% को घाटा
  • ताइवान में अनुभवी ट्रेडर्स को भी नहीं मिली राहत
  • ऑस्ट्रेलिया में सिर्फ फीस से ही निवेशकों को 7.3 करोड़ डॉलर का चूना

भारत का आंकड़ा इस ग्लोबल तस्वीर में कहां ठहरता है?

रिपोर्ट के मुताबिक भारत में इंडिविजुअल ट्रेडर्स में घाटे में रहने वालों की दर 87.7% है, जो इस ग्लोबल तुलना में ऊंचे स्तर पर आती है- यूरोप, फ्रांस और ब्रिटेन के आंकड़ों के काफी करीब, और अमेरिका व ऑस्ट्रेलिया के मुकाबले कहीं ज़्यादा. सिर्फ ब्राज़ील का 97% वाला आंकड़ा ही भारत से ऊपर है, वो भी सिर्फ लंबे समय तक डे ट्रेडिंग करने वालों के लिए.

रिपोर्ट खुद यह भी बताती है कि अलग-अलग देशों, प्रोडक्ट्स, समय-अवधि और रिसर्च मेथड की वजह से इन आंकड़ों की सीधी तुलना करना ठीक नहीं होगा. फिर भी कुल मिलाकर एक बात साफ उभरती है- चाहे शॉर्ट-टर्म फ्यूचर्स हों, CFDs हों या फॉरेक्स, दुनिया के लगभग हर बड़े बाजार में रिटेल भागीदारों के लिए मुनाफा कमाना एक अपवाद ही रहा है, नियम नहीं. भारत में F&O ट्रेडर्स को कितना नुकसान हुआ ये रिपोर्ट देखें

आगे इस ट्रेंड में क्या बदलाव आ सकता है?

रिपोर्ट के मुताबिक जिन बाजारों में रिटेल भागीदारी शॉर्ट-टर्म, लीवरेज्ड और सट्टेबाज़ी वाली ट्रेडिंग में ज़्यादा केंद्रित रहती है, वहां घाटे की दर भी ऐतिहासिक रूप से ऊंची बनी रहती है. भारत का पैटर्न भी इसी वैश्विक ढांचे से मेल खाता दिखता है, खासकर इंडेक्स ऑप्शंस जैसे शॉर्ट-टेन्योर प्रोडक्ट्स में बढ़ती दिलचस्पी के चलते.

फिलहाल यह साफ नहीं है कि यूरोप और ब्रिटेन जैसे बाजारों में सख्त डिस्क्लोज़र नियमों के बाद रिटेल घाटे की दर में आगे कोई बड़ा बदलाव आया है या नहीं, इस पर आधिकारिक ताज़ा आंकड़े अभी सामने नहीं आए हैं.

(डिस्क्लेमर – निवेश से पहले सर्टिफाइड सलाहकार से सलाह लें.)

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Anu

नमस्कार दोस्तों, मेरा नाम अनु कैरों है। मैंने साल 2016 में कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय से बिजनेस इकोनॉमिक्स में मास्टर डिग्री की है। मैं एक डिजिटल कंटेंट क्रिएटर हूं। मुझे बिजनेस सेक्शन में पर्सनल फाइनेंस, शेयर बाजार, म्यूचुअल फंड, इकोनॉमी जैसे विषयों पर ब्लॉग लिखना बेहद पसंद हैं। मेरा उद्देश्य पाठकों को फाइनेंस जगत से जुड़ी जानकारियां सरल हिंदी भाषा में उपलब्ध करवाना है।

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