SEBI Portfolio Analysis: 35% ट्रेडर्स के पास नहीं है एक भी शेयर, फिर भी लगा रहे F&O में बड़ा दांव

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हाइलाइट्स

  • 122.6 लाख में से करीब 43 लाख यानी 35% ट्रेडर्स के पास कोई इक्विटी पोर्टफोलियो नहीं.
  • छोटे पोर्टफोलियो वाले 78% ट्रेडर्स ने कुल टर्नओवर का 51% हिस्सा अकेले संभाला.
  • इन्हीं छोटे पोर्टफोलियो वालों को कुल घाटे का 70% हिस्सा झेलना पड़ा.
  • कुछ ट्रेडर्स का टर्नओवर उनके पोर्टफोलियो से 10,000 गुना तक ज़्यादा रहा.

SEBI Portfolio Analysis: शेयर बाजार के डेरिवेटिव्स सेगमेंट में ट्रेड करने वाले बहुत से लोगों के पास दरअसल कोई शेयर होल्डिंग ही नहीं है, फिर भी वे करोड़ों के टर्नओवर वाले सौदे कर रहे हैं. सेबी की अगस्त 2026 में जारी रिपोर्ट के मुताबिक FY25-FY26 के दौरान ट्रेड करने वाले करीब 122.6 लाख लोगों में से करीब 43 लाख यानी 35% के पास मार्च 2026 के आखिर तक कोई इक्विटी पोर्टफोलियो नहीं था.

असल में यह सिर्फ एक अपवाद नहीं, बल्कि एक बड़ा पैटर्न है. रिपोर्ट के मुताबिक करीब 37% यानी 45.1 लाख और ट्रेडर्स के पास ₹50,000 से कम का पोर्टफोलियो था. यानी कुल मिलाकर 72% ट्रेडर्स या तो बिना किसी शेयर होल्डिंग के, या बेहद मामूली होल्डिंग के साथ डेरिवेटिव्स में उतरे हुए हैं.

छोटे पोर्टफोलियो वालों का टर्नओवर इतना बड़ा क्यों है?

रिपोर्ट के मुताबिक जिन ट्रेडर्स का इक्विटी पोर्टफोलियो ₹1 लाख से कम है, उनकी संख्या 95.3 लाख यानी कुल ट्रेडर्स का 78% है. यह वर्ग कुल इक्विटी पोर्टफोलियो वैल्यू का सिर्फ करीब 1% ही रखता है, लेकिन इसके बावजूद कुल डेरिवेटिव्स टर्नओवर का 51% हिस्सा इसी वर्ग से आता है.

खास बात ये है कि इन्हीं छोटे पोर्टफोलियो वाले ट्रेडर्स को FY25-FY26 के दौरान कुल घाटे का करीब 70% हिस्सा झेलना पड़ा. इसके उलट, जिन ट्रेडर्स का पोर्टफोलियो ₹1 लाख से ज़्यादा है, वे कुल पोर्टफोलियो वैल्यू का करीब 99% रखते हुए भी कुल घाटे का सिर्फ 30% हिस्सा ही झेलते हैं.

पोर्टफोलियो कैटेगरीट्रेडर्स का हिस्साकुल घाटे का हिस्साघाटे में रहने वालों का %
स्मॉल-पोर्टफोलियो (<₹1 लाख)76%65%89.7%
मीडियम-पोर्टफोलियो (₹1-10 लाख)23%31%82.0%
लार्ज-पोर्टफोलियो (>₹1 करोड़)1%4%62.9%

टर्नओवर-टू-पोर्टफोलियो रेशियो का मतलब क्या है?

यह रेशियो बताता है कि किसी ट्रेडर का सालाना डेरिवेटिव्स टर्नओवर उसके इक्विटी पोर्टफोलियो के मुकाबले कितना बड़ा है. रिपोर्ट के मुताबिक ओवरऑल यह अनुपात करीब 41 गुना है, यानी एक औसत ट्रेडर अपने पोर्टफोलियो वैल्यू का 41 गुना टर्नओवर सालभर में करता है.

लेकिन स्मॉल-पोर्टफोलियो ट्रेडर्स के मामले में यह आंकड़ा बेहद चौंकाने वाला है. इनका औसत पोर्टफोलियो सिर्फ करीब ₹10,000 है, जबकि औसत सालाना डेरिवेटिव्स टर्नओवर ₹1.7 करोड़ से ज़्यादा है- यानी पोर्टफोलियो के मुकाबले करीब 1,665 गुना ज़्यादा टर्नओवर.

  • ओवरऑल टर्नओवर-टू-पोर्टफोलियो रेशियो: 41 गुना
  • स्मॉल-पोर्टफोलियो ट्रेडर्स: 1,665 गुना
  • मीडियम-पोर्टफोलियो ट्रेडर्स: करीब 44 गुना
  • लार्ज-पोर्टफोलियो ट्रेडर्स: सिर्फ करीब 8 गुना

पोर्टफोलियो जितना छोटा, घाटे का खतरा उतना ज़्यादा

रिपोर्ट के मुताबिक जिन ट्रेडर्स के पास कोई पोर्टफोलियो नहीं है या ₹50,000 से कम का है, उनमें घाटे में रहने वालों की दर सबसे ज़्यादा 93% रही. यह दर पोर्टफोलियो बढ़ने के साथ लगातार घटती गई- ₹1-10 लाख के पोर्टफोलियो पर 88%, ₹50 लाख-₹1 करोड़ पर 72% और ₹10 करोड़ से ज़्यादा के पोर्टफोलियो पर सिर्फ 58% रह गई.

यह पैटर्न लगभग हर पोर्टफोलियो कैटेगरी में एक जैसा दिखा, बिना किसी उलटफेर के- यानी जिस ट्रेडर के पास जितनी बड़ी शेयर होल्डिंग है, उसके नुकसान में रहने की आशंका उतनी ही कम है.

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सबसे बड़ा जोखिम किस कॉम्बिनेशन में छिपा है?

रिपोर्ट पोर्टफोलियो साइज़ और ट्रेडिंग तीव्रता दोनों को मिलाकर एक और अहम पैटर्न सामने लाती है. जिन ट्रेडर्स का पोर्टफोलियो छोटा है लेकिन टर्नओवर बहुत ज़्यादा है, वे कुल ट्रेडर्स का सिर्फ 13% होने के बावजूद कुल घाटे का 52% हिस्सा अकेले झेलते हैं- यानी यही समूह डेरिवेटिव्स सेगमेंट में घाटे का सबसे बड़ा स्रोत है.

इसके उलट लार्ज-पोर्टफोलियो ट्रेडर्स, चाहे उनका टर्नओवर कितना भी हो, कुल मिलाकर घाटे में सिर्फ करीब 4% का योगदान करते हैं. रिपोर्ट के मुताबिक हाई-टर्नओवर वाले ट्रेडर्स में भी स्मॉल-पोर्टफोलियो वालों का टर्नओवर उनके पोर्टफोलियो से 10,000 गुना से ज़्यादा तक पहुंच जाता है, जबकि लार्ज-पोर्टफोलियो वालों के लिए यह आंकड़ा सिर्फ करीब 12 गुना ही है.

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इसका मतलब आम ट्रेडर के लिए क्या है?

इन आंकड़ों से एक बात साफ निकलकर आती है- जो ट्रेडर्स अपनी असली आर्थिक क्षमता यानी अपने पोर्टफोलियो या बचत के मुकाबले कहीं ज़्यादा बड़े दांव लगाते हैं, उनके घाटे में फंसने का जोखिम भी सबसे ज़्यादा होता है. यह पैटर्न इस बात की तरफ इशारा करता है कि बहुत से छोटे ट्रेडर्स डेरिवेटिव्स में हेजिंग के लिए नहीं, बल्कि सीधे सट्टेबाज़ी वाली सोच के साथ उतर रहे हैं।

फिलहाल यह साफ नहीं है कि आने वाले समय में सेबी इस तरह के हाई-टर्नओवर, लो-पोर्टफोलियो पैटर्न पर कोई खास नियामकीय कदम उठाएगा या नहीं, इस पर आधिकारिक जानकारी अभी सामने नहीं आई है.

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(डिस्क्लेमर : निवेश से पहले सर्टिफाइड सलाहकार से सलाह लें.)

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Anu

नमस्कार दोस्तों, मेरा नाम अनु कैरों है। मैंने साल 2016 में कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय से बिजनेस इकोनॉमिक्स में मास्टर डिग्री की है। मैं एक डिजिटल कंटेंट क्रिएटर हूं। मुझे बिजनेस सेक्शन में पर्सनल फाइनेंस, शेयर बाजार, म्यूचुअल फंड, इकोनॉमी जैसे विषयों पर ब्लॉग लिखना बेहद पसंद हैं। मेरा उद्देश्य पाठकों को फाइनेंस जगत से जुड़ी जानकारियां सरल हिंदी भाषा में उपलब्ध करवाना है।

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